शब्द~
शब्दों को क्या मेरी जरुरत है, क्यूं सबने पैराहन पहना है,
सब आंख चुराते फिरते हैं, क्या इतना सच मैंने लिखा है।
हाल उनका भी मेरे जैसा है, अनोखी रस्म को जिंदा रखा है,
अच्छा कुछ भी नहीं लगता है, सच तो जीवन का हिस्सा है।
इलाक़ा शजर से यहां सबका है, पैसों पे फिर क्यों नज़र रखा है,
तुम्हारा दर्द अगर तुमको ही दिखता है, तो ये शरीर भी इक भिक्षा है।
आधों को तो खून ने पसपा है, आधों ने तो सूरज को भी जेब में रखा है,
बना रहे घर अपना कहीं जहां में, जहा घर था वहा अब क्या ही रखा है।
मतला ग़ज़ल में मेरे क्या झूठ मैंने बोला है, हर चीज़ का जहां हिस्सा है,
जहा आखों में धूल का झोंका है, वहां शब्द केवल कहने को सच्चा है।
By~ Pradeep Yadav
pairaahan;
पैराहन پَیراہَن
Persian ; Noun, Masculine
dress, long robe, apparel, attire, mantle
'ilaaqa;
'इलाक़ा عِلاقَہ
Arabic ; Noun, Masculine
attachment, affection, connection, dependence, relation, affinity
concern, interest, affinity
region, division
shajar;
शजर شَجَر
Arabic ; Noun, Masculine
a tree, a plant
भिक्षा;
alms, ख़ैरात, भीख
paspaa;
पसपा پسپا
defeated
लड़ाई में पीछे हटा हुआ, हारा हुआ, पराजित।
matl.a;
मतला مطلع
opening line of poem
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