शुरू कहा से करू?

गुलाब जैसी हो, बिल्कुल जहर लगती हो।
जरा सा जो मुस्कुरा दो, तो एकदम बेमिसाल लगती हो।
देखता ही रह जाता हूं तुम्हें, जो तुम आंखों में काजल यू प्यार से भर लेती हो।
मैं शायर तो नहीं, ना ही वह भाषा आती है।
पर वो क्या है ना, मुझे तारीफ तो बस तुम्हारी ही करनी आती है।
तुम्हारी तारीफ लिखने आया हूं शुरू कहां से करूं,
मोहब्बत की उस पहली मुलाकात से या प्यार में बिताए उस लम्हों की बात से!
सोने सी सुंदरता से या बेमिसाल मुस्कान से।
देखकर भोली सी सूरत तेरी, फूल महकने से लगे है,
शर्माती है जब तू, मेरी सीरत भी बहकने सी लगती है।
देख झूमती जुल्फें तेरी, फिजाएं भी दीवानी सी हो जाती है।
तारीफ तेरी कभी झूठी भी करता हूं?
तुझे खुद से प्यार हो जाए, फिर तुम्हें समझ आए,
मैं बातें इतनी दावे के साथ क्यों करता हूं।
इश्क कितना है कभी साबित नहीं करेंगे,
बस प्यार इतना करेंगे कि सुबह होने नहीं देंगे।
जिस्मानी नहीं जसबाते इश्क निभाएंगे,
अपनी दुनिया में कभी शाम ना हो जाए ऐसा आपका दिल नहीं दुखाआएंगे।
गलती का हर इल्जाम हम अपने सर ले लेंगे,
पर ऎ मोहब्बत हम तुम्हें बदनाम नहीं होने देंगे।
बदन की महक हो या चेहरे का नूर,
तुम इतनी खूबसूरत हो कि तुमसे इश्क क्यों ना हो जाए हुजूर।
खुदा से कभी मुलाकात हुई तो पूछेंगे जरूर,
तुम्हारी आंखों में ही नशा है या मैं हूं तुम्हारी मोहब्बत में कहीं गुम।
तुम्हारी एक झलक पाने को है हजारों तरसे,
तू यूं ज़ाया ना कर अपनी खूबसूरती को।
यहां बहुत से हैं तुम्हे अपने ख्वाबों में पाने की चाहत लिए,
तलब सी लगी है सभी को तुम्हे एक बार देखने के लिए।
तुमने मुझे जीने की एक नई वजह दी है,
हर वक्त साथ तो नहीं पर तुमने कोशिश पूरी की है।
तेरी तारीफ और क्या करूं इससे अच्छी!!
बस यह देख लो कि एक शायर तुम पर कुर्बान हो गया है,
शायर का दिल नहीं इसकी शायरी ने तुझे एक बार फिर फना कर दिया है।


                                     By— Pradeep Yadav

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