सफर
मैं पहाड़ चढ़कर उतर रहा हूं,
आज अपनों के लिए ही गैर बन रहा हूं।
फैलाई हुए थे अपने पंख मैंने,
अब अपने हाथों से ही कुतर रहा हूं।
चलता था गर्व से सर उठा के,
आज झुक के सलाम कर रहा हूं।
अपनी मोहब्बत को तुम्हारे नाम कर,
आज सुकून ढूंढ रहा हूं।
फिर से कोई ख्वाब ना देख लूं,
अपने आप को रोक रहा हूं।
मैं अब सोच रहा हूं,...
मैंने खुद का क्या हाल कर लिया है,
अपने आप से बार-बार पूछ रहा हूं।
अपने अंदर झांका तो जाना मैं बस एक मुसाफिर हूं,
घर से कब्र तक का सफर कर रहा हूं।
By— Pradeep Yadav
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