वो रात
आज फिर वो रात थी, साथ तेरी याद थी।
करने को बात थी, दिल ने खाई मात थी।
बनाकर मुझे अनजान, सताती तेरी याद थी।
चाहता मैं तेरा साथ था, करनी मुझे एक मुलाकात थी।
ढूंढ रहा मै मौका था, नींद ने आज फिर दिया मुझे एक धोखा था।
वो रात की बात की कितनी खास थी, जो आज तक मेरे दिल के पास थी।
बातों-बातों में जो ढली होगी, वो रात भी कितनी मनचली होगी।
सबने तेरी तारीफ की, अगर मै चुप रहा तो ये मेरी कमी होगी।
तेरे आंखों के नशे में अगर सब मदहोश हुए, तो मेरी आंखें भी भरी जरूर होंगी।
है तेरा जिक्र तो यकीन है मुझे, मेरे बारे में भी बात हुई होगी।
हां, तेरी कमी हरदम मुझे महसूस हुई होगी, पर जताया नहीं हूंगा शायद ये मेरी बदकिस्मती रही होगी।
अरे, अब भी कहने को बहुत कुछ है पर शुरू कहा से करू!
यूं तो कहने को धरती है, आसमान है,
पर तुम जो नहीं हो तो सुख कहां है।
यूं तो कहने को पूरी जिंदगी पड़ी है,
पर अब जीने को वक्त कहां है।
यूं तो कहने को रात है, नींद है,
पर सोने का मन कहां है।
यूं तो कहने को परिवार है, साथ है,
पर जो अपनों से भी खास हो ऐसा कहां है।
यूं तोकहने को सड़क है, राह है,
पर साथ मंजिल हासिल करने को हमसफर कहां है।
यूं तो कहने को तुम हो, मै हूं, नजरे है,
पर आंखें चार हो जाए ये किस्मत मेरी कहां है।
By— Pradeep Yadav
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