भेद-भाव
कभी-कभी ही लिखता हूं,
आज के युग की सच्चाई जैसा हूं।
इस लिए शायद पल भर के लिए ही ठहरता हूं,
जैसे हाथ में रेत हूं, शहर में पेड़ की छांव हूं।
सिर्फ किस्मत में नहीं,
अपनी कलम में भी दम रखता हूं।
दिल को बहलाने का सामान मत समझो,
मुझको इतना भी आसान ना समझो।
मैं भी सारी दुनिया की तरह जीने का हक मांगता हूं,
इसको गद्दारी का ऐलान ना समझो,
मैं हिंदू हूं या मुस्लिम हूं इससे मेरी इंसानियत को ना तौलो।
ना जाने कितना लोग भेदभाव करते हैं,
एक शरीर में दो दिमाग रखते हैं।
घर में तो देवी माता को चुनरी ओढ़ाते हैं,
और राह चल रही नारी का समाज में मजाक बनाते हैं।
रंग भेद, जाति भेद, लिंग भेद, धर्म भेद और ना जाने कौन–कोन से भेद की दौड़ है,
मै पीछे रह गया इस दौड़ में अपने इंसानियत पे गर्व है।
मैं मुस्लिम हूं तू हिंदू है, हैं तो दोनों ही इंसान,
ला मैं तेरी गीता पढ़ लूं, तू पढ़ ले मेरी कुरान।
ना हिंदू सिख ईसाई, ना ही मुसलमान,
इंसान हूं और इंसानियत पर विश्वास।
By— Pradeep Yadav
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