ज़िन्दगी
कभी शौक था लिखने का अपनी आज़द कलम से,
आज यही जिंदगी एक कैद पंछी बन के रह गई है।
खोकर उसे एक जिंदगी जी रहा हूं,
ना जाने लड़ रहा हूं या मर रहा हूं।
मन की किताब मेरी खुली रखी थी,
बस तलाश रही तो पढ़ने वालों की।
बहुत उड लिया ख्वाब के आसमानों में,
चलो अब जमीन की सतह खोजते हैं।
जिधर कोई ना हो, वो जगह ढूंढते हैं।
चलो हंसने की कोई, हम वजह ढूंढते हैं।
बहुत वक्त गुजारा है भटकते हुए अंधेरों में,
चलो अंधेरी रात का अंत ढूंढते हैं।
बहुत चल लिया जलते अंगारों पे, चलो अपनों से कहीं दूर चलते हैं।
मैंने अपने हिस्से की ज़िन्दगी जी ली, चलो मौत ढूंढते हैं।
By— Pradeep Yadav
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