बंद पड़े मकान की,
अंधेरी चारदीवारी में है वो।
सांस घुटती है जहां,
उसमे खुश है वो।
उजाला चमकदार है बाहर,
समझो आग है बाहर।
खिड़की खोलो जरा,
अनंत खुशियां हैं बाहर।
उसके जज्बात को अपनी मजबूरी ना बनाओ,
मोहब्बत थी तो खुद से ना झुठलाओ।
लबों को छूकर,
जिस्म से खेलते हैं।
दुनिया के सामने,
लिबास में लपेट-ते हैं।
अंधेरा ही अंधेरा है बाहर,
अंधेरे में दुनिया गुमशुदा है।
जरा बाहर तो देखो,
उजाले से जादा अंधेरा है।
अब रातों को चांद के भरोसे ना छोड़ो,
सूरज की रोशनी में निकलो।
बारिश के झोंकों से जो दीवार गिरी थी,
उस दो गज के घर को फिर आबाद करो।
इश्क में पहली सर्थ हाथ में हाथ डाल नीबाई थी,
कहा पता था होना जुदा था।
ख़्वाब तारों जितने थे,
लेकिन नींद पराई थी।
वो बिछड़ा अपनी दाली से,
दुनिया जैसे मुरझाई थी।
खुद को कोश रहा था,
जख्म की गहराई नाप रहा था।
डरा हुआ इतना था कि,
घर से उजाले में आने से काप रहा था।


                        By— Pradeep Yadav

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