मुसाफिर २
मुसाफिर हो ना मंज़िल की खोज होगी,
थोड़ी रुकावट तो आने दो तुम्हे खुद से नफरत होगी।
ढलती रात से डरते हो सुबह की तलाश में,
अपनी तक़दीर को बदलते हो दिन के ख़्वाब में।
ये सफर है तुम्हारा तुम्हे चलना पड़ेगा,
अगर कोई साथ नहीं दे तो भी मंज़िल तक पहुंचना पड़ेगा।
ख्वाहिशों का गला घोट दो किसी और से उम्मीदें छोड़ दो,
सुकून की लत है तो तकलीफ़ में जीना सीख लो।
ना जाने अगली शाम कब होगी ना जाने ज़िन्दगी कहा होगी,
जहां होगी वाहा नए लोग होंगे नई बातें होगी।
मेहनत की है तो चलते रहना मंज़िल की खोज में,
चलने में माहिर हो जाओगे या अच्छे मुसाफिर बन जाओगे।
By— Pradeep Yadav
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