पन्ना
जब उसके बारे में लिखा करता था,
पन्ना स्याही से भर जाया करता था।
थक जाता था लिखते-लिखते,
छाले दर्द किया करते थे और फिर खून आया करता था।
बैठा रहता था पेड़ की छांव में,
हवा जान छुड़ाया करता था।
लिखने की अभिलाषा में,
मैं खाना भूल जाया करता था।
बिन बात ये जिंदगी रुठा करती थी,
मैं रात-भर मनाया करता था।
जब अपना दर्द लिखा करता था,
पन्ना भी सिकुड़ जाया करता था।
By— Pradeep Yadav
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