कश्मकश

कहीं वो चेहरे का नूर नजर नहीं आया,
गई वो जिंदगी से तो फिर कोई और नहीं आया।
मुसाफिर हूं मैं अपनी ज़िन्दगी का,
अपने सहर कभी लौट के नहीं आया।
ना जाने क्या गुजरी होगी,
जो घर पहुंच के भी सुकून नहीं आया।


                     By— Pradeep Yadav

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