एक अज़ीज़ शख़्स

एक अज़िज शख्स था उसका,
एक परी जो खुशियां भरने आई।
वो चिराग घिस रहा था,
वो हर सुबह खैरियत पूछने आई ।
जो जल रहा था पराया हो के दिन-रात,
कल पेड़ लगाने वो फिर आई।
किसी कोने में वो रो रहा था,
और उसके आंसू पोछ जिंदगी में दखल कर आई।

              By— Pradeep Yadav

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