मैं अपने अंदाज़ में जाने कब इश्क़ बयां कर दूं,
इश्क़ की शुरूवात चालो मैं अल्फाज़ से कर लूं।
इश्क़ की गहराई में कुछ उम्मीद के भी बीज है,
कुछ रस्म इश्क के अंत में जिस्म की भूख है।
जीत तो कहीं हार है और इश्क़ की रह अनेक है,
सातिर है इतने की खुद के इश्क के अपने अर्थ है।
कुछ बईमान है तो कहीं कुछ लोग सुधार भी गए,
मैंने लिखा भी कब जब हम भी खुद से जुदा हो गए।
माना इश्क़ की गलियों में जाने से शर्मा रहे थे तभी,
मगर इश्क़ की खोज में आज भी
क्या होगा उनका जो यूं ही भटक रहे है अपने राह में,
बोल दो जमाने से इस जनाजे में भी सब है अपने मतलब से।
मेरे इश्क़ की चाहत इतनी पुरानी है की जन्मा ना होगा,
कोई क्या बराबरी करेगा इस इश्क़ की चाहत कौन करेगा।
दिखता है सभी इश्क़ में फर्क क्या इतने से ही चलेगा,
धोखे से उभर के हार जाना क्या यही इश्क़ में चलेगा।
मैंने लिखा होता इश्क़ तो अपनी और उसकी कुर्बानियां,
क्या अपने साथ के एहसास में मुकमल कहता कहानियां।
By~ Pradeep Yadav
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