संघर्ष
जज़्बात नहीं समझ पाई तुम,
अल्फ़ाज़ क्या समझोगी?
कभी आजाद हुआ करते थे जो खुशियों के पल,
आज कैद है वो तेरी दुहाई बन के।
उससे रूठ कर फिर उसी को मनाया,
जालिम इश्क ने क्या खूब सताया।
जिगर पर फिर चोट खाना हो गया,
फिर दिल उसका निशाना हो गया।
हर बार जैसा करता था वैसा किया नहीं,
रुकने का मैंने उसको इशारा किया नहीं।
वो आज भी मेरा इंतजार करती है,
लोग कहते हैं अब भी वो मुझसे प्यार करती है।
क्या तुम्हें बताऊं कि कितनी लाजवाब है वो,
मेरे हर सवाल का आखरी जवाब है वो।
यूं तो बहुत सारे ख्वाब सोच कर रखा हूं,
पर उसके लिए हर ख्वाब को समेट कर रखा हूं।
उसे देखता हूं तो मदहोशी छाने लगती है,
कदम बैठने लगते हैं ऐसी शराब है वो।
By— Pradeep Yadav
Speechless ♥️
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