"भारत की पहचान हिंदी और किसान"

पूरे देश को चलाता है गुमनाम शान है,
प्रकृति की मार खाकर भी पूरे देश का पेट भरता है।
हां! वो एक किसान है।
वो कहते हैं कि देश का विकास हो रहा है,
पर किसान मेरे देश का आज भी खून के आंसू रो रहा है।
गरीबी और महंगाई ने किया है उसे कुछ इस कदर चूर,
मौत को गले लगाने को आज है वो मजबूर।
भूखे पेट दिन-रात भाग रहा है,
सुबह और रातों में भी जाग रहा है।
बेईमानों के पेट भरे हैं,
खुद मेहनत करने वाला आज भीख मांग रहा है।
हमारा पेट तुम भरते हो,
सपने जो तुम्हारे हैं क्या तुम उन्हें पूरा करते हो?
झूठ है फरेब है मक्कार है ये दुनिया,
सच कहूं तुम्हें तो बेकार है ये दुनिया।


                                 By— Pradeep Yadav

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