भारतीय हूं

हिंदी में लिखूं या उर्दू में,
लिखता मैं कलम से हूं।
मंदिर में बैठु या मस्जिद में,
बैठता अपने वतन के जमीन पे हूं।
हिंदू हूं मुस्लिम से भी नाता रखता हूं,
भारतीय हूं भेदभाव पर विश्वास नहीं करता।
रमज़ान के रोजे हो, या सावन में सोमवार,
दोनों की मंजिल तो खुशी पाना है।
अरे ये सब पॉलीटिशियंस है,
सिर्फ बकवास बात करते हैं।
थाली में छेद कर-कर,
खाने की बात करते हैं।
ना दिवाली का जश्न है, ना रौनक है ईद की,
गुमसुम सा क्यों, ये नजारा हो गया।
चाह कर भी घर वो बचा ना पाया दंगों में,
इंसान क्यों इतना बेचारा हो गया।
तुम तोड़ते रेहना हम लोगों को हिंदू-मुसलमान के नाम पर,
लेकिन हम एक होंगे इस हिंदुस्तान के नाम पर।


                                      By— Pradeep Yadav

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