आवारा हूं।

मेरा कोई ठिकाना नहीं,
तू अपना घर बना।

मेरा कोई घर नहीं,
तू अपनी बस्ती बसा।

मेरी दिक्कतों का कोई हल नहीं,
तू अपनी मुश्किल जता।

मेरी रातें तो मुश्किल से गुजरती है,
तू रातों को जश्न मना।

मैं जो रूठ जाऊं कोई ना मनाए,
तू अपना परिवार बना।

मैं तो यूं दिखता नहीं,
तू खबरों में छा जा।

मैं तो एक आवारा मुसाफिर हूं,
तू अपनी मंजिल सजा।


                     By— Pradeep Yadav


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