लाया हूं~
आंखों को जो खोलकर मैं सारी राहें भूल आया हूं,
निकला था नई मंजिल पे तो रूपों में बाब लाया हूं।
निकला था नई मंजिल पे तो रूपों में बाब लाया हूं।
गम की रातों में जो उझाये था वाली वाला ख़्वाब लाया हूं,
मोहब्बत के प्याले में आसुओं की शराब लाया हूं।
खिड़की के रस्ते से लाया करता था सपने सारे मेरे,
वही से बाहरी दुनिया के कमरों की किताब लाया हूं।
पी रहा हूं आंखो ही आखों में बिना किसी ग्लास के,
शीशा भी नहीं है कोई हाथ में फिर भी जाम लाया हूं।
दिल के मकां को बचाने के लिए दौड़ा करो यार तुम भी,
मैं तो अंधेरों से लड़ने को फलक से सितारें तोड़ लाया हूं।
By— Pradeep Yadav
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