सिसकियाँ~
मिलेंगें कभी किसी मोड़ पर,
रूकेंगे दो कदम दूर ही,
पैरों में मेरे होंगी ज़माने की बेड़ियाँ,
मग़र मेरी रूह तुम्हारी रूह से,
लिपट कर लेंगी सिसकियाँ।
कलम काग़ज़ किताबों में समेटे,
रगों में घुलती हैं लम्हों की स्याहीयाँ,
जिस्म सुलगे उतना जितना चले,
कौन देखेगा मुझे इस चेहरे में,
किसको बयां करूंगा ये तन्हाइयाँ।
यादों में तेरे सुकून की खुलती थी,
बिन हवाओं के जो खिड़कियाँ,
मिलेंगे तुम्हें ये मालूम नहीं पर,
आती हैं रुक रुक कर साँसें,
सिमटी हैं टूटने को किर्चियाँ।
दिलों में तो था मौसम बर्फ़ का,
रूकेंगे दो कदम दूर ही,
पैरों में मेरे होंगी ज़माने की बेड़ियाँ,
मग़र मेरी रूह तुम्हारी रूह से,
लिपट कर लेंगी सिसकियाँ।
कलम काग़ज़ किताबों में समेटे,
रगों में घुलती हैं लम्हों की स्याहीयाँ,
जिस्म सुलगे उतना जितना चले,
कौन देखेगा मुझे इस चेहरे में,
किसको बयां करूंगा ये तन्हाइयाँ।
यादों में तेरे सुकून की खुलती थी,
बिन हवाओं के जो खिड़कियाँ,
मिलेंगे तुम्हें ये मालूम नहीं पर,
आती हैं रुक रुक कर साँसें,
सिमटी हैं टूटने को किर्चियाँ।
दिलों में तो था मौसम बर्फ़ का,
क्यों उदासी के दरख़्तों में है गर्मियाँ,
कैसे महसूस हो जाती है ये दूरियाँ,
नज़रें तुम्हारी इक झलक पा के,
लब हो गए लब से जुदा जैसे तितलियाँ।
फिर उठी दर्द की कैसी ये हिचकियाँ,
समझ आई मुझे कुछ बारीकियाँ,
तन्हाइयों में होते है पन्नों के अंत में,
बंद होती किताबों की हैं ये मजबूरियाँ,
कृष्ण और राधा के बीच रह गई थी दूरियाँ।
संसार भरी है जैसे कई पहेलियाँ,
प्यार है और है जिम्मेदारियाँ,
हर कोई फुर्सत से रखे तर्कियाँ,
तारीकियाँ बढ़ती जाए और,
बचती है चीखती ख़ामोशियाँ।
जुड़े हैं दिल से दिल के तार,
बिछड़ें तो ख़्वाब होंगे क़ैंचियाँ,
पास रह जाएंगी तो सिर्फ चिट्ठियाँ,
कुछ इस तरह जुड़ेंगे दूर होकर की,
जिंदगी सोएगी हमें कर बेदारियाँ।
मिलेंगे हम हर रोज़ लेकर,
अपने हाथों में तेरी उंगलियाँ,
खुले आसमां में किसी पेड़ के नीचे,
जुड़ जायेंगे हम जैसे फूल और पत्ते,
रह जायेंगी एक करने को टहनियाँ।
लब हो गए लब से जुदा जैसे तितलियाँ।
फिर उठी दर्द की कैसी ये हिचकियाँ,
समझ आई मुझे कुछ बारीकियाँ,
तन्हाइयों में होते है पन्नों के अंत में,
बंद होती किताबों की हैं ये मजबूरियाँ,
कृष्ण और राधा के बीच रह गई थी दूरियाँ।
संसार भरी है जैसे कई पहेलियाँ,
प्यार है और है जिम्मेदारियाँ,
हर कोई फुर्सत से रखे तर्कियाँ,
तारीकियाँ बढ़ती जाए और,
बचती है चीखती ख़ामोशियाँ।
जुड़े हैं दिल से दिल के तार,
बिछड़ें तो ख़्वाब होंगे क़ैंचियाँ,
पास रह जाएंगी तो सिर्फ चिट्ठियाँ,
कुछ इस तरह जुड़ेंगे दूर होकर की,
जिंदगी सोएगी हमें कर बेदारियाँ।
मिलेंगे हम हर रोज़ लेकर,
अपने हाथों में तेरी उंगलियाँ,
खुले आसमां में किसी पेड़ के नीचे,
जुड़ जायेंगे हम जैसे फूल और पत्ते,
रह जायेंगी एक करने को टहनियाँ।
By— Pradeep Yadav
किर्चियाँ;
shards, pieces of glass
दरख़्तों;
tree
तारीकियाँ;
darknesses
बेदारियाँ;
awakenings
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