क्या कहूँ~
क्या कहूँ कोई अरमान नहीं है,
रोना भी इतना आसान नहीं है।
ज़ीस्त की आहें घुट जाती है,
उल्फ़त में रौशन-दान नहीं है।
छोड़ दिए उन क़िस्सों को मैंने,
जिन क़िस्सों में अब जान नहीं है।
पहले चाहे जैसे भी जी लेते थे,
अब घर मेरा भी वीरान नहीं है।
उम्मीदों को तोड़ के जीना ये,
वहशत का कोई स्थान नहीं है।
जबसे समझा हूं मैं ये अफ़साना,
मेरे मन में कोई तूफ़ान नहीं है।
हँसने का कोई इनाम नहीं है,
प्यार करता है दिल नादान नहीं है।
देखने वाला देखे चाहे जैसे मुझको,
दिल का आईना मेरा हैरान नहीं है।
By— Pradeep Yadav
रौशन-दान;
chimney
मकान में रौशनी आने का सूराख ।।
वहशत;
Arabic ; Noun, Feminine
barbarity, wildness, ferocity, savageness, terror, frenzy, fright, horror, dread, solitude, loneliness
उल्फ़त;
love, friendship, affection
मोहब्बत, प्रेम
Comments
Post a Comment