अनजान
बहुत सी यादें तेरी, मै गांठ बांध के सो लेता हूं,
अनजान होके भी तुझ से, मै अकेले में रो लेता हूं।
घर से निकल के, मै उसी गली उसी चौराहे पे घूम लेता हूं,
अनजान होके भी तुझ से, मै अकेले में याद कर लेता हूं।
अब तेरी फिक्र में भी, मै खुद का स्वार्थ निकाल लेता हूं,
अनजान होके भी तुझ से, मै आंखों से सागर बहा देता हूं।
मै खुश हो जाता हूं जब, मै खत देखता हूं उसका,
की मै अनजान होके भी, खत बचा लिया भले रिश्ता नहीं।
By— Pradeep Yadav
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