अजीब सी खामोशी
देर रात लालटेन के उजाले में,
बैठा था दरिया के किनारे पे।
मै सोच रहा था कुछ,
कुछ खमोशी बोल रही थी।
रास्ता देखने वाली आंखें अब बंद हो रही थी,
कुछ काम बाकी था, पहली किरण सर चढ़ रही थी।
दिमाग बोल रहा था, की ख़ामोशी से बसर कर ले ज़िन्दगी,
दिल चाह रहा था, दुनिया को खबर हो जाए इस दर्द-ए-इश्क़ की।
मेरी खामोशी, मेरी जिंदगी होती जा रही है,
इश्क़ कौन सा जरूरी है, वो जख्म भरने जो रोज आ रही है।
अजीब सी ख़ामोशी है,
अजीब सी मुस्कान है...
ये कशमकश चार दिवारी की,
समंदर की तरह होती जा रही है।
By— Pradeep Yadav
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