पाप

कैसे-कैसे लोग सामने आने लगे हैं,
पैसा-पैसा लोग चिल्लाने लगे हैं।
जिस से बचपन में गलती करके कांपता था हर बच्चा,
आज घर से धक्का दे कर कह रहा है "अच्छा - अच्छा"!!
एक पुत्र नए ढंग से पाप कर रहा है,
आज वो अपनों पर ही सवाल कर रहा है।
पाप करके हमसे ही बवाल कर रहा है,
घर के अंदर अपने मां-बाप पे लाठी चार्ज कर रहा है।
उन घरों में जहां मिट्टी के घड़े होते थे...वहां ठंडा पानी पी रहा है,
बच्चों का सुख देखने में आज बूंद भी नसीब नहीं हो रहा है।
पैसा जब खोने लगे, मां-बाप को कोसने लगे,
जब वो कमाना बंद किए तो उनके खर्चे फिजूल लगने लगे।
जब सुख में कमी होने लगी,
तो उनके आंसू से पूरे करने लगे।
अब तो उस तालाब का पानी बदलने लगा,
ये कमल के फूल जहां है खिले...
आज उसको गंदा पानी बता कर बाहर करने लगा।
वो पैसों के लिए तो अब कायदे-कानून समझाने लगा,
एक कब्रिस्तान में घर था कभी उनका,
आज अपनों की मौत पर महल बनाने लगा।
मछलियों में तो कांटे छोटे-छोटे होते हैं,
कि अब वो अपनों का ही मांस नोचने लगे हैं।
अब वो नए तहजीब के पेश-ए-नज़र हैं,
की हम इंसान को भुन के खाने लगे हैं।


              By— Pradeep Yadav

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