लफ्ज़

हवा रुकी है, सफर भी खत्म हुआ।
अब कोई फसाना नहीं, कोई कहानी नहीं,
की सांस लेना फकत हुआ, अब कोई जिंदगानी नहीं।
कलम उदास है, लफ्जों में हमेशा सास छोड़ना लिखा है।
कल रात खून से जिस्म और आंसुओं से चेहरा भीग रहा था,
फिर कोई अपनी खुशियों के लिए किसी की इज्जत लूट रहा था।
उसके गम की परदा-दारी शायद खुदा भी नहीं कर पाया,
जिसने धूप निकलते ही उसे जल दिया था।
ऐ मेरे खुदा मेरी पुकार सुन,
यहां कइयों के ख़्वाब है, अनपे रेहेम कर दे।


                       By— Pradeep Yadav

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