मां

जो गुजर गया वो वक्त बे-वक्त की यादें थी,
मां की गोद में लौट गया वो शाम सुहानी थी।

जाने कब कैसे मैं तेरी चाहत में तलबगार हो गया,
मां के हाथ के खाने को छोड़ बाहर बर्बाद हो गया।

मोहब्बत की और तरसा हूं प्यार की खातिर कितना,
वो बचपना लौटा दो भूल गया हूं शरारत बचपन की।

फिर से पकड़ कर उंगली तेरे साथ चलना चलता हूं,
फिर से सोते वक्त कहानियां और गले लग सोना चाहता हूं।


                                      By— Pradeep Yadav

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