वो जो सबसे जुदा है

मोहब्बत के इस धुँधले जहाँ में, वो उजियारा है,
हर छलावे से परे, वो सच्चा इशारा है।

जहाँ लोग रूप पे मरते, वो भाव पे ठहरती,
उसकी नज़रों में दया है, उसकी बातों में पवित्रा है।

जहाँ होंठों पे छलकते हैं आजकल झूठ के अमृत,
वो सत्य की सरस्वती है, मन का निर्मल किनारा है।

किसी की हँसी में दिखावा, किसी की मुस्कान में भय,
उसकी हँसी तो गंगा जैसी, सब पाप धोती धारा है।

वो ना ज़ेवर की भूखी, ना चमत्कार की चाह,
सादगी का रूप लेकर, सौंदर्य का सागर उतारा है।

वो रोए तो लगें बादल, हँसे तो चाँद झुके,
उसकी आहट में भी रागिनी का स्वर पुकारा है।

दुनिया कहे ‘इंडिपेंडेंट’, मगर वो आत्मयुक्ता है,
नारी नहीं बस, अदिति-सी दिव्यारा है।

‘प्रदीप’ के दिल में वो रची ऐसे जैसे मन्त्र,
हर धड़कन में उसका नाम, हर श्वास में सहारा है।


                                          - Pradeep Yadav

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