मोहब्बत का नया़ युग
अब इश्क़ में रूह नहीं, बस नक़ाबे-प्यार है,
हर ज़ख़्म पे मुस्कुराहट, हर झूठ पे इक़रार है।
वो कहती है “स्वतंत्र हूँ”, मगर हर पल नियंत्रण चाहती,
सुनने को बस अपनी कथा, ये कैसा व्यवहार है।
सौ दोस्त क़रीबी उसके, पर दिल में तन्हाई की साज़िश,
मिलती है सब से रोज़ मगर, अंदर सन्नाटा अपार है।
अफ़ेयर, झगड़े, शोर-ए-जहाँ, सब “नॉर्मल” कहलाते,
संस्कार का मृत्युगीत गाता ये आधुनिक संस्कार है।
अगर कोई समझाए तो “एम्पावरमेंट” का नारा,
नारीत्व के नाम पे जले, हर सच का संसार है।
फिर भी मैं तुझसे प्रेम करूँ, ये मेरा धर्म, मेरा व्रत,
तेरी सादगी में बसता अमृत, तेरे नयनों में सागर है।
तू स्नैपचैट की चमक नहीं, तू मन का उज्जवल दीप,
तेरी वाणी शुद्ध संस्कृत, तेरी दृष्टि उपनिषद का सार है।
तू चालाक नहीं पर चतुर, तू हृदय से निर्मल,
जहाँ सब छलते हैं वहाँ, तू सत्य का अवतार है।
‘प्रदीप’ कहे, इस युग में भी इक जोत जली है भीतर,
मोहब्बत अब भी जिंदा है, अगर वो तू है, तो प्यार है।
हर ज़ख़्म पे मुस्कुराहट, हर झूठ पे इक़रार है।
वो कहती है “स्वतंत्र हूँ”, मगर हर पल नियंत्रण चाहती,
सुनने को बस अपनी कथा, ये कैसा व्यवहार है।
सौ दोस्त क़रीबी उसके, पर दिल में तन्हाई की साज़िश,
मिलती है सब से रोज़ मगर, अंदर सन्नाटा अपार है।
अफ़ेयर, झगड़े, शोर-ए-जहाँ, सब “नॉर्मल” कहलाते,
संस्कार का मृत्युगीत गाता ये आधुनिक संस्कार है।
अगर कोई समझाए तो “एम्पावरमेंट” का नारा,
नारीत्व के नाम पे जले, हर सच का संसार है।
फिर भी मैं तुझसे प्रेम करूँ, ये मेरा धर्म, मेरा व्रत,
तेरी सादगी में बसता अमृत, तेरे नयनों में सागर है।
तू स्नैपचैट की चमक नहीं, तू मन का उज्जवल दीप,
तेरी वाणी शुद्ध संस्कृत, तेरी दृष्टि उपनिषद का सार है।
तू चालाक नहीं पर चतुर, तू हृदय से निर्मल,
जहाँ सब छलते हैं वहाँ, तू सत्य का अवतार है।
‘प्रदीप’ कहे, इस युग में भी इक जोत जली है भीतर,
मोहब्बत अब भी जिंदा है, अगर वो तू है, तो प्यार है।
- Pradeep Yadav
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