मैं भी~

बेख़ुदी में कोई राँझा बन जाऊँ, मैं भी,

हीर की चाहत में खुद को भुलाऊँ, मैं भी।

मजनूं के जैसे बियाबान में भटकता फिरूँ,

लैला की यादों में खुद को सजाऊँ, मैं भी।

सहराओं में भी इश्क़ की राह निकालूँ,

तन्हाईयों में उसकी बात सुनाऊँ, मैं भी।

शायर की तरह उसके ग़म में डूब जाऊँ,

वो नज़्में लिखूँ, जो उसे रुलाऊँ, मैं भी।

रूमी के जैसे इश्क़ की बातें करूँ,

उसके कदमों में अपना सर झुकाऊँ, मैं भी।

हुस्न-ओ-इश्क़ की हर हद पार कर जाऊँ,

उसकी मोहब्बत में दीवाना बन जाऊँ, मैं भी।

वो जो भी चाहे, उसे लाकर दूँ,

उसके हर ख्वाब को हकीकत बनाऊँ, मैं भी।

फिर भी अगर उसकी चाहत में न कामयाब होऊँ,

उसकी तड़प में खुद को मिटाऊँ, मैं भी।



- प्रदीप यादव

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