मां-बाप ~

दुआ है मां-बाप का कोई बद्दुआ नहीं लगती,
अंधविश्वास में है शहर जो दावा नहीं लगती।

मैं उनके प्यार में बँध कर बना हूं ताकतवर,
लोग पूछते है हार जीत में क्यों नहीं लगती।

जब जुबां पे है शिकायत तो हवा क्यों नहीं लगती,
अपने हारने से ख़बर क्या तुम्हें ख़बर नहीं लगती।

अगर है इस ज़माने को मेरी फिक्र जो इतनी,
तो जान लो यार मुझे तुम्हारी ख़ता नहीं लगती।

फ़क़ीर सारे जहाँ के दुआएं देते होंगे क्योंकि,
मेरे मां-बाप की मुझे मेरे दिल पे नहीं लगती।

अहंकार है उनको और ये बात खराब भी नहीं लगती,
है ज़बाँ चुप और धड़कने उनकी धीरे भी नहीं लगती।


                                        By— Pradeep yadav


Comments

Popular Posts