सपनों की दुनिया

दूर एक पहाड़ पर चढ़ना था मेरा सपना,
चांद तारों के जैसा था मुझे चमकना।
बुलंद हौसलों के साथ निकला मैं करने पूरा सपना,
भूखा-प्यासा भटक रहा था, खोज रहा था मैं सपनों की दुनिया।
जो सपने देखे थे उन्हें पाने के लिए, मैं भीड़ में खड़ा था,
जहां सब जुगाड़ में थे वहां मैं अकेले ही चलने में खुश था।
उजाला छिप गया ऐसे की दिए का अंधेरा हो गया,
धुआं उठने लगा जैसे मेरे सपनों की दुनिया का वजूद ही खत्म हो गया।
बहुत मेहनत के बाद मुझे एक दिन मिल गया वो सपना,
दूर किसी पहाड़ पर पड़ा था वो सपना।
अमिट संघर्षों के बाद मिला था ये सपना,
चांद तारों की तरह चमकता हो गया था सच मेरा सपना।
पल भर की खुशी दे पाया मुझे मेरा ये सपना,
सपनों की दुनिया में खो जाऊंगा अब अपना।
लबों पे उसका नाम और आंखों में तस्वीर लिए,
पड़ा था धूल में वो सपना, अपनी उम्मीद लिए।
हाल-ए-दिल किसे बताता मैं,
उसकी खुशी के लिए निकल पड़ा, अपने सपनों की दुनिया में।

                             By— Pradeep Yadav

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