इश्क़ — दो तरफा
कुछ लिखना चाहता हूं, वक्त नहीं है।
उसे पाना चाहता हूं, कद्र नहीं है।
रूह से अपनाना चाहता हूं, समझ नहीं है।
हर खुशी है दामन में, एक उसकी हंसी चुराना चाहता हूं।
दिन-रात दौड़ती दुनिया में,
जिंदगी उसकी गोद में बिताना चाहता हूं,
मां की लोरी का एहसास तो है,
अब उसके साथ रातों को बातें करके बिताना चाहता हूं।
जिंदा हूं जब तक, उसके पास होना चाहता हूं,
हर मुसीबत में साथ खड़ा होना चाहता हूं।
राह अलग थी, चाह अलग थी,
मोड़ लिया था रश्ता, अब सब बताने की ज़रुरत ही कहा थी।
उसे फ़िक्र नहीं थी, मेरी परवा नहीं थी,
वो जानती थी मना लेगी, तभी तो झूठी मोहब्बत निभा रही थी।
सारे रिश्तो का गला घोट के, अब दूर होने का बहाना खोज रहे।
दिल में है तूफ़ान उठा,
ना चाहते हुए भी है हम खुद को कोस रहे है।
गैरों की क्या बात करें,
जब अपने ही प्यार का मजाक उड़ा रहे।
आंखों में है नींद बड़ी, सोने से ख़तम न होगी।
आदत हूं उसका, इतने आसानी से जाने न देगी।
इश्क़ है ये दो तरफा, अंजाम मुझे भी नहीं है पता।
By— Pradeep Yadav
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