कौन हूं मैं 😶?

खुद को भूल गया कि कौन हूं?
शायद इसीलिए मौन हूं।
क्यों खामोशी को तू लफ्जों में छुपाए बैठा है,
क्यों इन आंसुओं को नम आंखों में दबाए बैठा है।
कहते हैं खुदा है भी और नहीं भी...
क्यों तू फिर पत्थरों को खुदा बनाए बैठा है!!
क्यों तू जमीन को परिंदा का बसर बनाए बैठा है??
वैसे मैंने लिखा कुछ भी नहीं अब तक ख़ास,
सुना सब कुछ है, कहां कुछ भी नहीं।
जिंदगी में गम तो मिले हजारों लेकिन,
किसी से कहा कुछ भी नहीं।
ये जिंदगी है, थोड़ा मुस्कुरा कर जी लिया करो,
इस जहां में हमने किसी से कुछ लिया भी नहीं,
और मुस्कुराहट के सिवा कुछ दिया भी नहीं।
हजारों ख्वाहिशें ने दम तोड़ा है हर रोज...
यह वह कब्रिस्तान है, जिसे तुम दिल समझते हो।
              
                                    By— Pradeep Yadav

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