पाया नहीं, हारा नहीं~
ज़िन्दगी के सफर में खोया नहीं,
बिखरा हुआ ख्वाब था, पाया नहीं।
चाँदनी रातों में खोए हुए सपनों की दीदार में,
मैं सितारों को हाथों से सवार पाया नहीं।
आँखों में छुपे ख्वाबों की तलाश में,
मैं राहों में कई मंजिलों को नाप पाया नहीं।
खड़ा रहा लम्हों को हाथों में थामकर,
मगर समय को बचा पाया नहीं।
दिल में छिपी आशाएं बिना मिले ही रह गई,
बिखरे हुए ख्वाबों को साझा कर पाया नहीं।
ये जीवन की दास्ताँ, एक परदे की तरह रही,
राज़ और खुशियों को अपना पाया नहीं।
ज़िन्दगी के रंगों को सजाने का इरादा था दिल में,
पर वक़्त के साथ ही, वो पल मिल पाया नहीं।
अनजान राहों में चलते-चलते,
खुद को खो बैठा, पाया नहीं।
हर कदम पर मुश्किलें और रुकावटें मिली,
फिर भी हौंसला मैं हारा नहीं, हारा नहीं।
By— प्रदीप यादव
आपके शब्दों में छिपी गहराईयों को समझकर दिल को छू गया। जीवन के सफर में खोया हुआ, बिखरा हुआ और पाया नहीं ख्वाबों की बातें सबके दिल में होती हैं। आजकल की भागदौड़ और स्त्रीयों के सम्मान की बढ़ती मांग के दौर में, आपकी रचना वाकई मयने रखती है।
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