दास्तान~

ख्वाबों की बस्ती में रहता हूँ,
मौत से भी अलग, खुदा के पास रहता हूँ।

चांदनी रातों में गुमसुम रहता हूँ,
खोया हुआ चेहरा, तेरे पास रहता हूँ।

हर लम्हा मेरे जीने का वादा है,
ये नींद के साथी, क्यों तुझसे दूर रहता हूँ।

जो दिल की हालत पे हँसी लाता था,
वो वक्त चला गया, अब मैं चुप ही रहता हूँ।

ताकतों और ज़ोहद के बावजूद देखो,
अपनी प्रकृति में डूबा हुआ प्रकृति में रहता हूँ।

इस ज़िंदगी के ताकत भरे आवाज़ बहुत हैं,
पर अब तो अपनी आवाज़ के पास ही रहती हूँ।


                                                   by- प्रदीप यादव 

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