वीरों की चमक~
उठो और जगो, आहुति दो ज्योति की,
कहो देश को, सुन लो ताज़ देमोक्रेसी की।
छठी संसद का उद्घाटन, भक्ति के लालसा से,
दिखावटी नेता, नज़र को झपटा रहा वहीं।
दिल्ली की पुलिस, केंद्र की हवाओं में झुलती,
बिखर गयी शहीदों की पीड़ा, वो चिल्ला रही।
महिलाओं की ताक़त, देश की गर्वगाथा है,
मगर दिखाए इतना ग़मंद, वह कौन सा पाठा है?
रंग-बिरंगे खिलौने हैं, इस जंग में हमारे,
संकट के समय तक खामोशी, तब कहाँ जाते हैं?
पुलिस के हाथों, जब वो धकेलती है सेना को,
क्या फ़सलते नदियों को रोक पाएगी मेंढ़क रास्तों में?
हमारी जुनून से, इन्कलाब की राह में,
जो हालात सँवार दीं, वो खूबसूरत ज़फ़र हैं।
ग़ंभीर मुद्दों पर, राजनीति का क्या काम है?
करे जनता से प्रेम, नेता वहीं कहाँ हैं?
नारी अधिकारों की बजाय, विवादों का पुजारी,
किसके खिलाफ़ हैं ये रंग-रलियों की टोली?
अपमान की विडम्बना, हृदय में उठी है,
मूर्खता के चादर से, वो हीनता बिखेर रही।
आज फूल बनकर हम खिलते, तो उन्हें बवंडर,
हैवानियत का चश्मा लगाकर, रहमत नहीं छिड़की।
फिरती थी हमेशा से अमन की वादियों में,
आहुति दो ज्योति की, उठो और जगो आप लोग।
हमें याद रखोगे वीरों के नाम, उम्मीद है,
सदियों तक तारीखों पर, चमकेगी आपकी ताला।
by— प्रदीप यादव
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