चोर~
जब बेटियों को चूम रही शर्मनाक चोट,
खुलेआम फिर घूम रहा ब्रष्ट नेता मनमौज।
युद्ध की खातिर जब तड़पतीं लड़ी बेटियां,
फिर क्यों उनकी जिद्द हो जाती है अधूरी राज-मौज।
मनमौज बने फिरते दल-दलित नेता,
जब भ्रष्टाचार ने घेर लिया इतना शोर।
आंखों के सामने चमकती हैं सच्चाई की बूंदें,
पर वह नेता बना रहता है धोखेबाज जोर।
बेटियाँ बदनाम होती हैं उनकी मर्यादा पर,
नेता खुले आम ढोंग से संतुष्ट रहता है अपनी छोर।
इन दुष्कर्मी नेताओं की जब घड़ी होगी सजा की ओर,
तब उजागर होगी सत्ता के पर्दे की कड़ी चोर।
जनता के सपनों के रेंगते जुआरी नेताओं,
तुम्हारी तो सत्ता की भूख में लगता है भोर।
क्या जवाब देगी इस बार की वोट बैंक की दौर,
या होगा नागरिकों के लिए फिर इंतजार और।
अपराधों की गहरी छाप छोड़ता है नेता,
जब आदान-प्रदान होता है रूपियों के सौदे का दौर।
नेताओं की जाएगी राजनीति अंतिम साज़िश की ओर,
जब आम लोगों की आवाज़ बनेगी ताक़त की तोर।
By— प्रदीप यादव
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