प्यार है~
दोनों जहाँ सिमट कर रह गए जबसे मुझे प्यार है,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र-गुज़र गए गुज़र हज़ार है।
दिखी नहीं ज़िंदगी भर जिसको उसाँस क्यों,
लगता है आज कल वो नई धुन पर सवार है।
मिले है उनसे कई दफा इस बार त्वचा हैरान है,
छोडूं या कैद कर लूं ये सांसे सीने पर भार है।
चंचल सी वो जिसके स्वर-ग्राम की दरकार है,
जिसके आखर से मेरे शब्दों का लय-भार हैं।
सादापन धीरे-धीरे उखाड़ती है वो मुझमें से,
जिद्दी है और अपने ही ज़िद पर तैयार है।
इश्क़ में बर्दाश्त का कोई तो इलाज़ होगा यारा,
मुझे लगता है मेरे दिल को तुमसे दिली प्यार है।
By— Pradeep Yadav
उसाँस;
संस्कृत ; संज्ञा पुल्लिंग
ऊपर को खींची गई गहरी साँस; उच्छवास; उसास।
किसी मानसिक कष्ट के कारण ली गई गहरी साँस।
स्वर-ग्राम;
संगीत में, सा से नि तक के सातों स्वरों का समूह
आखर;
संस्कृत ; संज्ञा पुल्लिंग
अक्षर; वर्ण; जो क्षर (नाश) नहीं होता।
शब्द, वचन।
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