मोहब्बत~
अपनी मोहब्बत को आज हम आए हैं ये जरा समझाने को,
शहर के शहर आए तो भी नहीं फ़र्क पड़ता है तेरे दीवाने को।
हमारे दौर के कुछ रूठ-उठकर चले गए मगर मुस्तइद है तेरा ये दीवाना अभी,
की सारे जाने किस्मत से पाए हैं तुझे ढूँडकर मोहब्बत की राह बचाने को।
तू वोही शख़्स रही जिसे देख हुई खुद की गुत्थी सुलझाने को,
वो बात अलग है की तू मुक़द्दर रही हमेशा दर्पन में फ़रज़ाने को।
इस शम्अ में बेनाम-ओ-निशाँ थे की हर जनम में तुझसे ऐसी ही मुलाकात रहे,
ता-क़यामत तक की दीवानगी में इक साल गया और एक है नया आने को।
हां, मैं चुप रहा तेरे चेहरे पे साँस लेकर खुद की जान बचाने को,
भला मैं और करता भी क्या सर-फिरों सा बेहोश हूं तुझे पाने को।
By— Pradeep Yadav
मुस्तइद;
ready, prepared, worthy
मुक़द्दर;
Arabic ; Noun, Masculine
destined, predestined, ordained by God, preordained
decreed (by God), appointed, predetermined
fate, destiny
फ़रज़ाने;
wise, intelligent
बेनाम-ओ-निशाँ;
nameless
sham.a:
शम्अ';
lamp/ candle
परतव-ए-ख़ुर;
sun's reflection
Light, Image
ता-क़यामत;
upto dooms day
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