गुलाब से बढ़कर

तेरी ख़ुशबू में जो नशा पाया है,

कहीं गुल ने भी वो मज़ा पाया है?

तेरी बातों में वो लहज़ा देखा,
कि बहारों ने तुझमें क़ज़ा पाया है।

तेरी आँखों में जो चमक देखी है,
उसे जुगनू ने भी दिया पाया है।

तेरे रुख़सार पे जो रंग आया,
गुलाबी सुबह ने सिला पाया है।

तेरे होठों पे जो हँसी देखी है,
खिलते फूलों ने वो सबा पाया है।

तेरी ज़ुल्फ़ों में जो अंधेरा मिला,
उसे रातों ने भी क़बा पाया है।

तेरी आहट में जो सदाएँ उठीं,
ख़ामुशी ने भी इक सदा पाया है।

कोई माने न माने, पर सच ये है,
गुलाबों ने तुझमें ख़ुदा पाया है।



                                       - प्रदीप यादव

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