बैठे इक सफ़र में जो इश्क़ सा है लगे~

जबसे मिला तुमसे इक ज़िंदगी को देखा है इतने क़रीब से,
ज़िंदगी के हर रंग, हर मोड़ पे तुम्हारे साथ हूं बैठे मैं।

अब इस शहर का मौसम भी मुझको बड़ा सुहाना लगे,
पीछे भागा नहीं कभी फिर सड़के क्यूं जिंदगी की मिसाल लगे।

तेरी मोहब्बत की मिसालें जो सदैव मेरे दिल में हैं बसी,
वो सुनहरे पलों की किताबें खोलकर फिर पढ़ता हूं बैठे मैं।

कहा जब गीत तो फिर गीत सा मज़मून क्यूं मैंने लिख दिया,
कुछ लिखूं ऐसा भी जो सबको न ग़ज़ल-ग़ज़ल जैसी लगे।

कहां गया बचपन ख़राब करके मुझे तिरे असीर ज़ुल्फ़ों में,
इन लचकती हुई ज़ुल्फ़ों का गोकुल लिया हूं गजलों में बैठे मैं।

क्यूँकर कहूँ तारीफ़ में ताकि नज़रें नीचे हो मेरी फिर भी,
मेरे दिल की तारीफ़ तिरे ये दिल को न भीतर-घात लगे।

तवारीख़ मिलने की कहां बिकते है की पूरी कर लूं बातें मैं,
शा'इर मैं नहीं गुफ़्तार में तिरे रूप का दर्पन लिया हूं बैठे मैं।


                                                             By— प्रदीप यादव 

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