आया हूँ~

अपने रिसते हुए इश्क़ की दीवार दिखाने लाया हूँ,
काम आई है वही छाँव जहां ता-उम्र कुम्हलाया हूँ।

बस ऐसे में ही खो गई थी कलम दोहरी बोझ में,
खोखली पड़ती दुनियां में अपनी पहचान पाया हूँ।

रख ली समेटकर ऐ-दिल जिसको अपने सीने में,
कफ़-ए-पा ग़र चूमूँ तो जाने क्यों तुम्हें हैरत पाया हूँ।

माजरा-तलब नहीं निगाह-ए-नाज़ से नाज़ पाया हूं,
इक तस्वीर खींची है मगर उसमें भी मैं शरमाया हूँ।

मैं कि अब सुनो तिरी ही हर दीवार का साया हूँ,
हर दफा बे-ख़्वाब तुम्हें दरीचों से घुसा लाया हूँ।

लाख कंकड़ लाख मिरी राह के सब पत्थर भी बने,
ठान कर पा-शिकस्ता भी तिरी राह में चल पाया हूँ।

तहज़ीब इश्क़ की सुनसान पन्ने पे लिख लाया हूँ,
मैं जिस्म से- पहचान से- रूह से तुम्हारी काया हूँ।

अब अस्र-ए-नौ मुझको सीने से लगा कर रख लो,
मैं तुम्हारी सदाओं में ज़ख़्मी स्याही भूल आया हूँ।



                                                           By- प्रदीप यादव 




अस्र-ए-नौ;
new age
आधुनिक काल, नवीन काल, मौजूदा समय

कुम्हलाया;
Shrivelled; withered

पा-शिकस्ता;
broken-footed, helpless

तहज़ीब;
अरबी ; संज्ञा, स्त्रीलिंग
संस्कृति, सभ्यता
शिष्टाचार, भल-मनसाहत, सज्जनता

कफ़-ए-पा;
sole of the foot

माजरा-तलब;
requiring; need for --occurrence, adventure; thing past:—state, condition, circumstance.

निगाह-ए-नाज़;
look of love

Comments

Popular Posts