रंग-ए-सुख़न~

नसब की ज़बान है ऊँची तो जरा ख़ामोश रह लेंगे,
ख़ामोश जो ज़मीं पर रहे हैं महवश से कैसे बोलेंगे।

जो ना-शुनीदा लफ़्ज़ रहे रंग-ए-सुख़न में घोलेंगे,
चेहरा देख गुप-चुप रहे मगर तेरी तस्वीर से बोलेंगे,
जाने कब तक तिरी तस्वीर में रही निगाहें मेरी,
इक हवा की लहर आए ऐसी की पूरे तेरे हो लेंगे।

तुम नहीं बोलती हो तो मत बोलो हम भी नहीं बोलेंगे,
रुख़ पे हवा के हो लिए तो पलकों को दरिया से धोलेंगे,
तेरे रूठने पर संसार निसार रहे अपनी नाव डुबो लेंगे,
तुम जो यूं ही और दूर रहे तो हम राहों में कांटे बो लेंगे।

सो कर उठ गए हैं ख्वाबों से तेरे सोचा है आज रात को,
चांद की पिघलती हुई चांदनी में हम बस तुमको देखेंगे।

                                       By ~ Pradeep Yadav 
महवश;
moon-faced
beautiful as moon

नसब;
Arabic ; Noun, Masculine
genealogy, family, lineage, race, caste

ना-शुनीदा;
unheard

रंग-ए-सुख़न;
color of poetry

रुख़;
Persian,English,Sanskrit ; Noun, Masculine
attention, favour
cheek, face, countenance, side, front
face, appearance,direction, features/ the castle in the game of chess

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