तेरा ही~
ये ग़म का ख़ज़ाना है तेरा ही, ये नज़म से नज़राना है तेरा ही,
मिलोगी मुझसे तो पूछेगा जमाना भी, क्या हूं अब भी मैं तेरा ही।
मिलोगी मुझसे तो पूछेगा जमाना भी, क्या हूं अब भी मैं तेरा ही।
जिन चमन के फूलों पर तू चुप थी, जिनमें रंग था कुछ तेरा ही,
मिलोगी मुझसे तो कैसे चुपेगी ये महक, जिसमें नाम है तेरा ही।
ये शीशों पर खरोंच है तेरा ही, उनमें अलग होने का नक़्श था तेरा ही,
मिट पाती ये जो लकीर पानी के जैसी, तो मैं होता आज भी तेरा ही।
मिट पाती ये जो लकीर पानी के जैसी, तो मैं होता आज भी तेरा ही।
By— Pradeep Yadav
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