मां~
काम करते हुए सबकी ऊंची आवाज़ सुनती है वो,
मुस्कान ज्यादा है और थकती कम है इन दिनों,
बज़्म-ए-तख़य्युलात में महबूबा तहरीक है आज कल,
बे-लौस रब्त कैसे है खुदा का बीमार इन दिनों।
दकियानूसी की आखें बंद करके ताबे' हैं मां के कहने,
क्योंकि आखों से दिखता है ऐसा झूठ बोला करती इन दिनों,
अब जो उसने अपना लिया है सबको ग़म के साथ-साथ,
तो वो घुटनों की पीड़ा में जाग कर सोती है इन दिनों।
खुद के फटे कपड़े सिलते हुए पैसे दे कर कहती थी मुझसे,
जाकर नया पहन और नया बनकर निकला कर इन दिनों,
मैं झगड़ जाता था पैसों की तंगी में भी और कपड़ों को,
अब जाना मेरी सदाएँ कपड़ों की ख़ाक निकली हैं इन दिनों।
बग़ैर मां के गवारा हो ये लिखते वक्त भी कांपते है हाथ मेरे,
मौज़ूँ नहीं है तू वक्त के साथ सबने महरूमियों में बोला था,
गर्मी से सर्दी तक क्या मालूम कैसे सोती रही होगी,
मां का होना क्या होता है जाना है मैंने और इन दिनों।
लाए कहां से इतने बादल समेट कर उसकी छत पर,
डर तो इस बात का है फिसल कर गिर न जाए इन दिनों,
सुबह से शाम तक भीगी और ज़ब्ह हो जाती है रात तक,
बच्चों की जरूरत देख दे देती है अपनी रोटी भी इन दिनों।
सब उलझे-उलझे से रहते है अपने काम में इन दिनों,
बस एक वक्त ही खा पाती है परिवार संग वो इन दिनों,
बरसों से पुकारता रहा हुनर जब उसका पूछा तो बोली,
कूचे में दर्द बिताया रोग भी मारा गया था इन दिनों।
तमाम लफ्ज़ों में रौशन है एक शब्द में नायाब सी है वो,
ममता में समुंदर रखी और अब लाई है दुआ इन दिनों,
थी पहले से सवाल मेरे हर ना-समझी की ज़िद में जो,
अब तो छुप कर वो कहती है मुझे समझदार इन दिनों।
रस्मों-रिवाजों में बंधी हसरत से देखा था मिट्टी का घर कभी,
उतर चुका है लाखों चांद हर सर-ए-शाम में मुख़ालिफ़ बनकर,
मां मुझसे नाराज़ ना हो जाए यही डर रहता है इन दिनों,
मां तुझसा ना मिलेगा कोई मो'तबर मुझको इन दिनों।
क्या करू मैं मां रोज़ पूछता हूं हाल जो तेरा इन दिनों,
खुद से कुछ घंटों का समय मांगना पड़ता है तेरे लिए इन दिनों,
क्या करूं हुजूम-ए-यास में तू बीमार रहती थी जो इन दिनों,
की जैसे गर्द कोई आँधियों के साथ चलता हो इन दिनों।
मेरे मुख से दुख को भाप कर चाय में समोती थी हर दिन जो,
देखा है मैंने खुद को दबाकर उभारा था फिर से तूने इन दिनों,
अश्कों से नमनाक हैं ये आखें तेरे बुजुर्ग होने से मां इन दिनों,
तेरे होने की ख़ुशबू से तब तलक रौशन रहेगा घर इन दिनों।
इल्तिजा में जन्नत और सब फ़लक के सितारों में हैं इन दिनों,
प्रदीप' ने थामा है मां का हाथ शायद यही ज़रूरत है इन दिनों।
By— Pradeep Yadav
बे-लौस;
without any self-interest
Generous, Unbiased, Uncompromising
रब्त;
Arabic ; Noun, Masculine
bond, binding, relation, intimacy, link, connection, social bonding
बज़्म-ए-तख़य्युलात;
assembly of imagination
तहरीक;
Arabic ; Noun, Feminine
putting in motion, motion or formal proposal put up for approval, motion
proposal, suggestion
temptation
दकियानूसी;
Adjective
conservative, orthodox, narrow minded, superstitious
सदाएँ;
voices
ताबे';
knuckle under, obedient, obsequious
अ. वि. वशवर्ती, वशीभूत, अधीन, जेरे हुक्म, आज्ञाकारी, फरमाँबरदार, अनुयायी, अनुकर्ता, मुक़ल्लिद ।
मौज़ूँ;
Arabic ; Adjective
proper, fit, apt, appropriate, suitable, symmetrical
महरूमियों;
bereft, devoid of
deprivations
ज़ब्ह;
Arabic ; Noun, Masculine
slaughter, sacrifice
slaughtered animal, animal to be slaughtered
कूचे;
Noun, Masculine, Plural
narrow streets, lanes
सर-ए-शाम;
evening, about evening time
मुख़ालिफ़;
Arabic ; Adjective
opposite, an opponent, unfavourable, contrary, adverse, unfavourable
opponent, enemy, adversary, foe
मो'तबर;
trustworthy, reliable
हुजूम-ए-यास
mob of despair
निराशा की भीड़
समोती;
dipped
अश्कों;
Persian ; Noun, Plural
tears
नमनाक;
moist, damp
गीला, तर, आई ।
इल्तिजा;
Persian, Arabic ; Noun, Feminine
prayer, begging, entreaty, request, supplication, solicitation, petition, appeal, request
फ़लक;
Arabic,Sanskrit ; Noun, Masculine, Singular
fortune, fate
sky, heaven, firmament,
a wood with holes pierced and tied high, put the feet of the criminal in it and hang it upside down and flogged
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