क्रांति ~

सियासत बदलने से पहले, नीयत का इंक़लाब ज़रूरी है
शहर को रोशन करने से पहले, दिल का आफ़ताब ज़रूरी है
हाथों में नारे बहुत हैं, आँखों में सपने भी
मगर सपनों से पहले, नींदों का हिसाब ज़रूरी है
हर ज़ुल्म को कोसते हैं, हर दौर को बुरा कहते हैं
आईना देखने से पहले, ख़ुद से सवाल-जवाब ज़रूरी है
तारीख़ ने ये सिखाया है, हर बड़ी बग़ावत से पहले
एक खामोश सी छटपटाहट, एक तन्हा सा ख़्वाब ज़रूरी है
जो भीड़ में चल पड़े, वो क्या राह दिखाएगा
रास्ता बनने से पहले, चलने का अदाब ज़रूरी है
बाहर की आग बुझाने निकले हो तुम जिस जोश में
सीने में सुलगती चिंगारी का इंक़लाब ज़रूरी है
प्रदीप, दुनिया को बदलने की क़सम अच्छी है मगर
इस क़सम से पहले, ख़ुद पर एतिमाद ज़रूरी है

                                         By - प्रदीप यादव 


इंक़लाब – क्रांति, बड़ा बदलाव
सियासत – राजनीति
नीयत – इरादा, मन की भावना
आफ़ताब – सूरज
हिसाब – लेखा, गिनती, आत्म-मूल्यांकन
ज़ुल्म – अत्याचार
दौर – समय, युग
आईना – दर्पण
सवाल-जवाब – आत्म-परीक्षण, खुद से पूछताछ
तारीख़ – इतिहास
बग़ावत – विद्रोह
छटपटाहट – बेचैनी
ख़्वाब – सपना
अदाब – शिष्टाचार, मर्यादा
जोश – उत्साह
सीना – हृदय, दिल
चिंगारी – छोटी आग, शुरुआत
मक़ता – ग़ज़ल का आख़िरी शेर, जिसमें शायर का नाम आता है
एतिमाद – भरोसा, विश्वास

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