शब्दों की तासीर-

शब्दों की तासीर से छनती,
मन की गहरी कशमकश,
कभी बिखरी बूँदें बन जातीं,
कभी सावन की बारिश।

हर अक्षर में बसी है बुनावट,
कभी मीठा दर्द, कभी खट्टा सवाल,
कभी आहटें किसी पुराने रिश्ते की,
कभी नए ख्वाबों की हलचल।

कभी वीरानगी का सन्नाटा,
कभी महफ़िलों का शोर,
शब्द ही तो हैं, जो गढ़ते हैं,
मन के हर भूले-बिसरे छोर।

कभी इश्क की फितरत में बहकते,
कभी विद्रोह की आग में जलते,
कभी माँ की लोरी से सुलाते,
कभी भगत की हुंकार से जगाते।

इनमें बसती है आत्मा,
सदियों की कहानियों की,
इन्हीं से बनी है दुनिया,
ख़्वाबों और अरमानों की।

आज इस दिवस पर मान दो,
उन हर एहसासों को जो लिखे गए,
कभी किसी की कलम से बिखरे,
तो कभी दिलों में छुपे रहे।


                      - Pradeep Yadav

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