मिरे ज़ीस्त में~
तुझे ज़ीस्त में पाकर क्या हादिसा हुआ है,
मिरे ज़ीस्त में फ़स्ल-ए-गुल महका हुआ है।
कहना ये भी ग़लत नहीं जुनूँ इश्क़ का था मेरा,
तू उतरी सराब सी और समुंदर बहका हुआ है।
तिरी निगाह ने हल्का सा नक़्श छोड़ा हुआ है,
मिरे नज़रों में इश्क़ कुछ और गहरा हुआ है।
झुलस-झुलसकर अंजाम-कार निशाँ छोड़े ग़र,
सबा तिरे एहसासों का मुद्दतों से ज़हरा हुआ है।
किस फ़िक्र में दिल ये अंदाज़ा-ए-सहरा हुआ है,
पाकर खो देने का मिरे ख़्वाबों पर पहरा हुआ है।
बस इक रात से मिरे घर में चाँद उतरा हुआ है,
तबसे ही ये दिल तिरे चेहरे पर ठहरा हुआ है।
दीदा-ए-शौक़ में बे-वजह क्या दरबहरा हुआ है,
इश्क़ में तिरे कलम भी साग़र-ए-सहबा हुआ है।
By— प्रदीप यादव
फ़स्ल-ए-गुल~ वसंत ऋतु, बहार का मौसिम, फूलों का मौसम।
अंजाम-कार~ फलस्वरुप, consequently.
सबा~ पूर्वी हवा, पूरब से पश्चिम की ओर चलने वाली हवा, बयार।
प्रभात और प्रातः काल के समय चलने वाली अच्छी और ठंढी हवा जो प्रिय लगती है।
ज़हरा~ bright/luminous/beateous.
अंदाज़ा-ए-सहरा~ style of desert
दरबहरा~ एक तरह की शराब, एक प्रकार का मद्य जो कुछ वनस्पपियों की सड़ाकर बनाया जाता है।
साग़र-ए-सहबा~ glass of wine
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