फरिश्तों की रातें~
रातें नहीं आती,
सुबह का सोया हूं,
किसी का यूं तो नहीं हुआ की भुलाने नहीं आती,
शायर पे बीती नहीं मगर,
भुला हूं जबसे उसे मुझे बातें नहीं आती,
मेरी अब रातें नहीं आती,
कोई मेरे दिल से पूछे,
जो बचे हैं संग उनमें सांसे नहीं आती,
मुझे अब सांसे नहीं आती,
ये हुस्न ओ इश्क बस इक दोखा है,
ये बातें समझते हैं सभी,
फिर भी ये बातें सबके समझ में नहीं आती,
जागा हूं मैं फरिस्तों में,
अकेला हूं जिसकी राते नहीं आती,
आती है फिर जाती नहीं,
ख़ामोशी छुपाती नहीं,
तस्वीरें हैं उसकी आंखों में,
ये बंद होती है खुद को बुझाती नहीं,
बदलते हुए फरिश्तो में,
नकली ज़िंदगी में आदमी हूं मैं,
नज़रिया बदलते मगर,
निगाहों में नई ज़िंदगी नहीं आती।
By— Pradeep Yadav
Comments
Post a Comment