कुछ ख्वाहिशें

इस कविता के सागर में,
मैं अपनी रीत सुनाने आया हूं।
दिल का दर्द नहीं,
मैं अपनी कला का परचम लहराने आया हूं।
बादल से ऊंचा तो मै नहीं,
पर ख्वाब रचाए बैठा हूं।
चांद से चांदनी नहीं,
धूप में कमीज भिगाया हूं।
मै तो हार के रो लेता हूं,
दाग ए-बेज्जती का सेह लेता हूं।
सपने बड़े है अहंकार से,
इस लिए तो अपने से बड़ों की डांट भी सुन लेता हूं।
ढूंढ रहे सारे दुनिया में कमी,
अपने अंदर कौन झांके?
सबके भीतर हैं कमियां,
चलो आज खुद सुधारें।


            By— Pradeep Yadav

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